सम्प्रदायिक द्वेष फैलाने वालों के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा क्यों नहीं ?
सम्प्रदायिक द्वेष फैलाने वालों के खिलाफ
देशद्रोह का मुकदमा क्यों नहीं ?
जैनधर्म अहिंसा व संयम में विष्वास रखने वाला धर्म है। ’अहिंसा परमो धर्मः’, ’जीयो और जीने दो’ व ’संयमः खलु जीवनम्’ इसके मुख्य सूत्र है। जैन धर्म में प्रतिवर्ष व दिवसीय पर्यूषण व सम्वत्सरी के महापर्व के अवसर पर विषेष साधना उपासना का क्रम रहता है। मुम्बई में इस पर्यूषण व सम्वत्सरी के अवसर पर मुम्बई बी.एम.सी. द्वारा 4 दिनों के लिए ’मीट बेन’ के निर्णय को लेकर राजनैतिक सियासत गरमा गई है। उद्धव ठाकरे व मनीष तिवारी ने जिस भाषा का प्रयोग करते हुए ’मीट बेन’ के इस निर्णय के खिलाफ जहर उगला है वह उनकी संकीर्ण सोच का परिचायक है।
प्रत्येक प्राणी में भगवान का अंष मानने वाली इस संस्कृति वाले भारत देष में पवित्र भावना से लिए गये इस करुणाप्रद निर्णय का विरोध करना आष्चर्य सहित खेद का विषय है। मीरा-भईन्दर की मेयर गीता जैन का पर्यूषण के अवसर पर लिया गया ’मीट बेन’ का निर्णय स्वागत योग्य है। वास्तव में यह निर्णय सराहनीय व समयानुकूल सही फैसला है। इसे सकारात्मक दृष्टिकोण से देखना चाहिए तथा धन्यवाद करना चाहिए कि कुछ दिनों के लिए जीव हिंसा से तो बचाव हुआ। ठाकरे व तिवारी जैसे नेता जो सम्प्रदायिकता का वैमनस्य फैलाने में विष्वास रखते हैं, चन्द वोटों के लिए इस निर्णय में राजनीति कर रहें हैं। वस्तुतः उन्हें इस निर्णय के पीछे उद्येष्य व प्रतिफल को देखना चाहिए।
सब जीना चाहते हैं, मरना कोई नहीं चाहता। प्रत्येक प्राणी में अपने समान ही प्राण होते हैं। पुनर्जन्म में विष्वास करने वाली संस्कृति के लोग मानते हैं कि प्रत्येक प्राणी 84 लाख योनियों में कहीं भी जन्म ले सकता है। अतः मीट खाने वाले व्यक्ति यह क्यों नहीं सोचते कि जिस जीव का मीट खा रहें हैं वह किसी भी जन्म में किसी भी रूप में मित्र, नाते, रिष्तेदार भी रहे हो सकते हैं। किसी भी प्राणी की हत्या को मानवीय संवेदना रखने वाला व्यक्ति समर्थन नहीं कर सकता।
उच्च न्यायालय ने गणतंत्र दिवस, महा शिवरात्रि, रामनवमी, महावीर जयन्ती, देवन्द्र मुनि निर्वाण दिवस, बुद्ध पूर्णिमा, स्वतंत्रता दिवस, कृष्ण जन्माष्टमी, ज्योतिराव जयन्ती, अम्बेडकर जयन्ती, गणेश चतुर्थी, ऋषि पंचमी, अनन्त चतुर्दशी, गांधी जयन्ती एवं निर्वाण दिवस, पेड़ा ग्यारस, छोटी दीपावली, दीपावली, कार्तिक पूर्णिमा, अग्रसेन जयन्ती आदि कई पवित्र दिवसों व उत्सवों, त्योहारों पर बूचड़ कसाई खाने व पशुओं को कत्ल कर मांस आदि का विक्रय करने पर पाबन्दी का निर्णय दिय हुआ है। कोई सरकार या लोकतांत्रिक संस्थाऐं इसे लागू करती है तो इस पर कुतर्क देने के बजाय निर्णय के लिए साधुवाद देना चाहिए। हर बात में राजनीति तलाषना उपयुक्त नहीं है।
ठाकरे का यह कहना कि मुस्लिम समाज के लिए तो पाकिस्तान है, जैनी कहां जायेंगे ? भारत कोई ठाकरे की बपौती नहीं है। मुस्लिम हो या जैन, या कोई अन्य, किसी भी भारतीय व्यक्ति या समूह के लिए लोकतंत्र में इस तरह की भाषा का प्रयोग अषोभनीय ही नहीं गैरकानूनी भी है। भारत का तो नामकरण ही जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर ऋषभनाथ के पुत्र राजा भरत के नाम पर हुआ है और ठाकरे कहता है कि जैन कहां जाओगे ? सस्ती लोकप्रियता बटोरने के लिए इस प्रकार के वक्तव्य देना न तो स्वयं ठाकरे के व न ही देष के हित में है। सम्प्रदायिक द्वेष फैलाने व देष को तोड़ने वाले, देष के अमन चैन व शान्ति को नष्ट करने वाले इस प्रकार के कृत्यों के खिलाफ तो देषद्रोह का मुकदमा दर्ज होना चाहिए। मीडिया भी अनावष्यक रूप से अच्छे निर्णय के विरोध को स्वर न दें तो उपयुक्त रहेगा।
देशद्रोह का मुकदमा क्यों नहीं ?
जैनधर्म अहिंसा व संयम में विष्वास रखने वाला धर्म है। ’अहिंसा परमो धर्मः’, ’जीयो और जीने दो’ व ’संयमः खलु जीवनम्’ इसके मुख्य सूत्र है। जैन धर्म में प्रतिवर्ष व दिवसीय पर्यूषण व सम्वत्सरी के महापर्व के अवसर पर विषेष साधना उपासना का क्रम रहता है। मुम्बई में इस पर्यूषण व सम्वत्सरी के अवसर पर मुम्बई बी.एम.सी. द्वारा 4 दिनों के लिए ’मीट बेन’ के निर्णय को लेकर राजनैतिक सियासत गरमा गई है। उद्धव ठाकरे व मनीष तिवारी ने जिस भाषा का प्रयोग करते हुए ’मीट बेन’ के इस निर्णय के खिलाफ जहर उगला है वह उनकी संकीर्ण सोच का परिचायक है।
प्रत्येक प्राणी में भगवान का अंष मानने वाली इस संस्कृति वाले भारत देष में पवित्र भावना से लिए गये इस करुणाप्रद निर्णय का विरोध करना आष्चर्य सहित खेद का विषय है। मीरा-भईन्दर की मेयर गीता जैन का पर्यूषण के अवसर पर लिया गया ’मीट बेन’ का निर्णय स्वागत योग्य है। वास्तव में यह निर्णय सराहनीय व समयानुकूल सही फैसला है। इसे सकारात्मक दृष्टिकोण से देखना चाहिए तथा धन्यवाद करना चाहिए कि कुछ दिनों के लिए जीव हिंसा से तो बचाव हुआ। ठाकरे व तिवारी जैसे नेता जो सम्प्रदायिकता का वैमनस्य फैलाने में विष्वास रखते हैं, चन्द वोटों के लिए इस निर्णय में राजनीति कर रहें हैं। वस्तुतः उन्हें इस निर्णय के पीछे उद्येष्य व प्रतिफल को देखना चाहिए।
सब जीना चाहते हैं, मरना कोई नहीं चाहता। प्रत्येक प्राणी में अपने समान ही प्राण होते हैं। पुनर्जन्म में विष्वास करने वाली संस्कृति के लोग मानते हैं कि प्रत्येक प्राणी 84 लाख योनियों में कहीं भी जन्म ले सकता है। अतः मीट खाने वाले व्यक्ति यह क्यों नहीं सोचते कि जिस जीव का मीट खा रहें हैं वह किसी भी जन्म में किसी भी रूप में मित्र, नाते, रिष्तेदार भी रहे हो सकते हैं। किसी भी प्राणी की हत्या को मानवीय संवेदना रखने वाला व्यक्ति समर्थन नहीं कर सकता।
उच्च न्यायालय ने गणतंत्र दिवस, महा शिवरात्रि, रामनवमी, महावीर जयन्ती, देवन्द्र मुनि निर्वाण दिवस, बुद्ध पूर्णिमा, स्वतंत्रता दिवस, कृष्ण जन्माष्टमी, ज्योतिराव जयन्ती, अम्बेडकर जयन्ती, गणेश चतुर्थी, ऋषि पंचमी, अनन्त चतुर्दशी, गांधी जयन्ती एवं निर्वाण दिवस, पेड़ा ग्यारस, छोटी दीपावली, दीपावली, कार्तिक पूर्णिमा, अग्रसेन जयन्ती आदि कई पवित्र दिवसों व उत्सवों, त्योहारों पर बूचड़ कसाई खाने व पशुओं को कत्ल कर मांस आदि का विक्रय करने पर पाबन्दी का निर्णय दिय हुआ है। कोई सरकार या लोकतांत्रिक संस्थाऐं इसे लागू करती है तो इस पर कुतर्क देने के बजाय निर्णय के लिए साधुवाद देना चाहिए। हर बात में राजनीति तलाषना उपयुक्त नहीं है।
ठाकरे का यह कहना कि मुस्लिम समाज के लिए तो पाकिस्तान है, जैनी कहां जायेंगे ? भारत कोई ठाकरे की बपौती नहीं है। मुस्लिम हो या जैन, या कोई अन्य, किसी भी भारतीय व्यक्ति या समूह के लिए लोकतंत्र में इस तरह की भाषा का प्रयोग अषोभनीय ही नहीं गैरकानूनी भी है। भारत का तो नामकरण ही जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर ऋषभनाथ के पुत्र राजा भरत के नाम पर हुआ है और ठाकरे कहता है कि जैन कहां जाओगे ? सस्ती लोकप्रियता बटोरने के लिए इस प्रकार के वक्तव्य देना न तो स्वयं ठाकरे के व न ही देष के हित में है। सम्प्रदायिक द्वेष फैलाने व देष को तोड़ने वाले, देष के अमन चैन व शान्ति को नष्ट करने वाले इस प्रकार के कृत्यों के खिलाफ तो देषद्रोह का मुकदमा दर्ज होना चाहिए। मीडिया भी अनावष्यक रूप से अच्छे निर्णय के विरोध को स्वर न दें तो उपयुक्त रहेगा।
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