चेतना के जागरण के लिए समता की साधना आवश्यक
चेतना के जागरण के लिए समता की साधना आवश्यक जैन लूणकरण छाजेड़ हमारे भीतर अनन्त चेतना का स्त्रोत प्रवाहित हो रहा हेै। अपने आपको उस स्त्रोत में आप्लावित रखने के लिए उस स्त्रोत को देखना आवश्यक है। जो उस स्त्रोत को देख लेता हेैं उसके आस-पास मैत्री की धाराएं फूट पड़ती हैं । मै़त्रीभाव विश्व -बन्धुत्व का पहला सूत्र है। जो व्यक्ति प्रतिक्षण जागृत रहता हैं और द्वेषभाव से दूर रहता है, वह प्रशस्त जीवन जी सकता है। प्रशस्त जीवन का अर्थ है ऋजुता और मृदुता का विकास। ऋजु और मृदु व्यक्ति समभाव की साधना कर सकता है। जो समभाव की साधना करता है वह आत्मभाव को प्राप्त होता है और आत्मभाव ही अनन्त चेतना का जागरण है। समभाव शब्द समान दृष्टिकोण या निष्पक्षता का प्रतीक है। इसका अर्थ है हर परिस्थिति, व्यक्ति या घटना के प्रति समान दृष्टिकोण रखना, चाहे वह सुखद हो या कष्टप्रद। समभाव का अभ्यास करने से हम द्वेष, पक्षपात या भेदभाव से ऊपर उठते हैं, और अपने मन को शांति और स्थिरता की ओर अग्रसर करते हैं। अनन्त चेतना हमारी आत्मा या ब्रह्मांडीय चेतना की उच्चतम अवस्था को दर्शाता है। अनन्त चेतना ...