चातुर्मास: तप, साधना और संयम का पावन काल-
चातुर्मास (अर्थात् चार महीने) वर्षा ऋतु के दौरान आने वाली वह धार्मिक अवधि है जो हिंदू, जैन और बौद्ध धर्मों में आत्म-शुद्धि, संयम और साधना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह अवधि हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक होती है। चातुर्मास त्याग और तपस्या ही सच्चे सुख का आधार हैं, और संयम से ही आत्मा का उध्दार संभव है। चातुर्मास का धार्मिक महत्व विष्णु शयन की परंपरा (हिंदू धर्म) इस दौरान माना जाता है कि भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसलिए शुभ कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश आदि इस अवधि में नहीं किए जाते। तप और संयम का समय (जैन धर्म) जैन धर्म में चातुर्मास का विशेष स्थान है। जैन साधु-साध्वियाँ इस समय विहार वर्जना (यात्रा न करना) का पालन करते हैं और एक ही स्थान पर रहकर तप, स्वाध्याय, और प्रवचन करते हैं। यह काल श्रावकों के लिए भी व्रत, संयम और धर्माराधना का अनुपम अवसर है। चातुर्मास के व्यावहारिक कारण वर्षा ऋतु की कठिनाई: प्राचीन समय में कीचड़ और नदी-नालों के उफान से यात्रा जोखिम भरी होती थी। सूक्ष्म जीवों की रक्षा: बरसात में उत्पन्न...