गंगाशहर एवं तेरापंथ धर्मसंघ
- जैन लूणकरण छाजेड़, गंगाशहर (बीकानेर)
राजस्थान के प्रमुख शहरों में अग्रणी बीकानेर का उपनगरीय क्षेत्र गंगाशहर व्यवस्थित ढंग की बसावट के साथ ही धार्मिक-आध्यात्मिक, सामाजिक एवं आर्थिक सम्पन्नता के चलते देशभर में अपनी विशेष पहचान रखता है। यह क्षेत्र सर्वधर्म सद्भाव का जीता जागता प्रतीक है। बीकानेर के कुशल प्रशासक महाराजा गंगासिंह जी ने अपने नाम से विक्रम संवत् 1948 में इसकी स्थापना की थी। बीकानेर शहर से 5 किमी दूर दक्षिण दिशा में भीनासर एवं बीकानेर के मध्य अवस्थित पूरा गंगाशहर दो खंडो में आबाद हुआ। सर्वप्रथम पुरानी लेन बसी तदुपरांत विक्रम संवत् 1970 में नई लेन आबाद हुई। कस्बाई और शहरी संस्कृति के अद्भुत समन्वय में स्थापित गंगाशहर की गौरवशाली ऐतिहासिक विरासत का कोई सानी नहीं है। भौगोलिक दृष्टि से गंगाशहर के दक्षिण में भीनासर, पूर्व में घड़सीसर एवं पश्चिम में सुजानदेसर है। बीकानेर, उदयरामसर एवं घड़सीसर से गंगाशहर काफी निचाई पर बसा हुआ है। तीनों तरफ से ऊँचाई होने से रात्रिवेला में प्रवेश करते हुए यह क्षेत्र एक मनोहारी दृश्य उपस्थित करता है।
गंगाशहर का नगर नियोजन
सुन्दरतम एवं नियोजित ढंग से बसे कस्बों में विशेष पहचान रखने वाले गंगाशहर की बसावट बेहद आकर्षक-सुविधासम्पन्न रही है। बीकानेर से भीनासर तक की मुख्य सड़क गंगाशहर को दो भागों में विभाजित करती है, पूर्वी भाग में नई लेन एवं पश्चिमी भाग पुरानी लेन से जानी जाती है। पुरानी लेन की बसावट पर गौर करें तो यहां की गलियां सीधी एवं सपाट, मगर समानान्तर नहीं है। इसमें चौक कम है। वहीं नई लेन की सभी गलियां समानान्तर तथा एक-दूसरे को काटती हुई चलती है एवं मुख्य चौड़ी गलियों के चौरस्तों पर चार प्लॉटों को खाली छोड़कर चौक बनाये गये हैं। नई लेन में महावीर चौक, गौतम चौक , महाप्रज्ञ चौक , गाँधी चौक , इंदिरा चौक, पाबू चौक, दो बोथरा चौक एवं हरिरामजी मंदिर चौक है। इस क्षेत्र में बनी हवेलियां लाल पत्थर पर उकेरी गयी स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। वर्तमान में शहर का विस्तार पूर्वी व पश्चिमी भागों में तेजी से हो रहा है एवं नोखा रोड़ के पार भी कोलोनियां बस गयी है।
धर्म एवं समाज
गंगाशहर धार्मिक आस्था का प्रमुख केन्द्र है। बीकानेर रियासत ने गंगाशहर में आबाद होने के लिए केवल नारियल एवं सवा रुपये में 1176 गज (4704 स्कवायर फीट) के रिहायशी प्लॉटों का आवंटन किया, जिसके फलस्वरुप देशनोक, रासीसर, पारवा, देरासर, गुसांईसर, रायसर, गेरसर, बादनूं, रानीसर, सींथल, कस्तूरिया, केसरदेसर इत्यादि लगभग 84 गाँवों से परिवार आकर यहाँ बसे। यहाँ के मोहल्लों के नाम भी उस क्षेत्र में बसी अधिसंख्यक जाति के नाम पर प्रचलित हुए, जिन्हें चौपड़ा गली, चौरडिय़ा चौक, बोथरा चौक, गेरसर मोहल्ला , करनाणी मोहल्ला, सारड़ा मोहल्ला, मालू गली आदि नामों से जाना जाता है। याहं की वर्तमान आबादी दो लाख से अधिक है।
विभिन्न मतावलम्बियों एवं धार्मिक आस्थाओं के गंगाशहर निवासियों में अद्भुत धार्मिक सहिष्णुता है। इस क्षेत्र में सभी धर्म सम्प्रदायों के साधु-साध्वी, संत, आचार्य, कथा वाचक एवं उपदेशक पधारते हैं। उनके प्रवचन, सत्संग, कथा-वाचन, भजन-कीर्तन में सभी समुदायों के लोग उपस्थित होकर लाभान्वित होते हैं एवं सेवाभाव में पूर्णरुपेण समर्पित भी रहते हैं। सभी धर्मों के साधु-संतों के समय-समय पर होने वाले समागम से गंगाशहर अध्यात्मिकता क्षेत्र में सदैव से विशेष पहचान रखता आया है। क्षेत्र में सर्वाधिक संख्या जैन समुदाय की है या यूं कहें कि यह जैन समाज का एक अच्छा गढ़ है। वर्तमान में यहाँ दो हजार से अधिक तेरापंथी ओसवाल परिवारों के घर हैं। साथ ही माहेश्वरी, अग्रवाल, ब्राह्मण, माली, जाट, बिश्नोई, कुम्हार, राजपुरोहित, सुनार, नाई, दर्जी, मुसलमान, हरिजन, नायक, मेघवाल सहित प्राय: सभी जातियां निवासरत है। सभी वर्गों एवं समुदायों में अच्छी मैत्री एवं भाईचारे की भावना है। सभी धर्मावलंबियों के ख्यातनाम पूजा, प्रार्थना एवं उपासना स्थल यहाँ मौजूद हैं। हिन्दू धर्म के देवी-देवताओं के प्रमुख मंदिरों के साथ ही तीन जैन मंदिर, दो मस्जिद, कबीर चौकी, रजनीश आश्रम, स्थानकवासी स्थानक, तेरापंथ का साध्वी सेवा केन्द्र शांति निकेतन, तेरापंथ भवन का प्रेक्षा प्रवचन पण्डाल, पूजा व उपासना स्थलों से यह क्षेत्र सुशोभित है। अधिकांश निवासियों का उद्योग व व्यवसाय यहीं पर है। ज्यादातर लोग कुटीर उद्योग जैसे भुजिया , पापड , चुरी ( सौंफ) से भी जुड़े हुए हैं।
गंगाशहर इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों में तेरापंथ
संस्थापना काल के कुछ दिनों बाद से ही तेरापंथ के साथ गंगाशहर का गहरा जुड़ाव बना। बीकानेर-देशनोक चातुर्मास करने के लिए जिन साधु-साध्वियों का यहां पदार्पण होता, उनका कुछ समय गंगाशहर में भी अवश्य प्रवास रहता, जिसका लाभ स्थानीयजनों को भरपूर मिलता।
परिपार्श्व के गाँवों से गंगाशहर में बसे ओसवाल परिवारों के सदस्य साधु-साध्वियों से घंटों तत्त्व चर्चा कर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त करते। गुरुवृन्दों से तत्व समझाकर सम्यक्तव-दीक्षा की प्राप्ति भी उन्हें होती। इस बुनियादी कार्य में मुनिश्री फौजमलजी (242) तथा साध्वीश्री गंगाजी (444) का सुनियोजित प्रयत्न सर्वाधिक उल्लेखनीय रहा। इस कार्य में श्रावक भैंरुदानजी ईशरचंद चौपड़ा परिवार का प्रयास एवं योगदान भी पूर्णरूप से सराहनीय था। चौपड़ा परिवार द्वारा प्रदत्त 'शान्ति निकेतन भवन" शताब्दिधिक वर्षों से तेरापंथ गतिविधियों का केन्द्र रहा है। जिसे वर्तमान में सुरेन्द्रसिंह चौपड़ा ने तेरापंथ साध्वी सेवा केन्द्र के रुप में समाज को समर्पित कर दिया है।
गंगाशहर में सर्वप्रथम चातुर्मास विक्रम संवत् 1967 में मुनिश्री आनंदरामजी द्वारा किया गया। तत्त्व ज्ञान और सुसंस्कारों के वपन की दृष्टि से क्षेत्र में मुनिश्री पृथ्वीराजजी की महत्वपूर्ण भूमिका एवं 15 वर्ष के स्थिरवास बेहद उपयोगी सिद्ध हुआ। नवमाधिशास्ता आचार्यश्री तुलसी ने विक्रम संवत् 1994, 200 , 2028 एवं 2038 के मर्यादा-महोत्सव तथा विक्रम संवत् 2000 और 2035 के चातुर्मास प्रदान कर इस धरती का गौरव बढ़ाया।
आचार्य श्री कालूगणी और गंगाशहर
तेरापंथ के आचार्यों की असीम कृपा भी इस क्षेत्र पर रही है। सर्वप्रथम तेरापंथ के अष्टमाधिशास्ता पूज्य आचार्यश्री कालूगणी ने इस धरती को पावन किया। इस उभरते हुए क्षेत्र में आपश्री के विक्रम संवत् 1983 व 1989 में हुए चातुर्मास से क्षेत्रवासी धन्य-धन्य हो गए।
आचार्यश्री तुलसी और गंगाशहर
तेरापंथ के नवमाधिशास्ता आचार्यश्री तुलसी का आचार्य बनने उपरान्त विक्रम संवत् 2000 में आचार्य रुप में प्रथम चातुर्मास से यह धरा पावन हुई। आचार्यश्री का जब-जब इस चोखले में पदार्पण होता, क्षेत्र को दीर्घकालीन प्रवास का लाभ प्राप्त होता। आचार्यश्री का दूसरा चातुर्मास विक्रम संवत् 2035 में हुआ। आचार्यश्री के सान्निध्य में विक्रम संवत् 1994, 2000, 2028 एवं 2038 में कुल चार मर्यादा महोत्सव यहाँ मनाये गये।
धवल समारोह
आचार्य तुलसी की शासना के उपलब्धि-भरे पचीस वर्षों की परिसम्पन्नता पर समायोजित 'धवल समारोह" का द्वितीय एवं मुख्य आयोजन से भी यह धरा पावन हुई। उस दौरान आचार्यश्री का सार्वजनिक अभिनंदन करते हुए भारत के उपराष्ट्रपति डॉ. एस. राधाकृष्णन् ने देश के शीर्षस्थ राजनेताओं, समाजसेवियों, साहित्यकारों, पत्रकारों की उपस्थिति में एक विशाल अभिनंदन ग्रंथ उन्हें समर्पित किया। उस ऐतिहासिक क्षण की साक्षी बन यह धरती भी अपने-आप में ऐतिहासिक बन गई।
आचार्यश्री महाप्रज्ञ और गंगाशहर
आचार्यश्री महाप्रज्ञ ने अपने वैरागी अवस्था में सर्वप्रथम आचार्यश्री कालूगणी एवं मुनि तुलसी के दर्शन इसी पावन भूमि पर किए थे।आचार्यश्री तुलसी के महाप्रयाण पश्चात् एक सक्षम, समर्थ और गुणसम्पन्न उत्तराधिकारी के रुप में धर्मसंघ के नेतृत्व की बागडोर थामने वाले आचार्यश्री महाप्रज्ञ को अग्रगण्य बनाकर विक्रम संवत् 2000 में आचार्यश्री तुलसी ने स्वतंत्र चातुर्मास के लिए विहार कराया।
12 नवम्बर, 1978 को गंगाशहर में आयोजित हुए दीक्षा समारोह में आचार्यश्री तुलसी ने आपको 'महाप्रज्ञ" अलंकरण से अलंकृत किया।इसी धरा पर 6 जुलाई, 1997 को आचार्य महाप्रज्ञ अभिवंदना समारोह चतुर्विध संघ द्वारा मनाया गया।
आचार्यश्री तुलसी के महाप्रयाण के बाद आचार्यश्री महाप्रज्ञ ने विक्रम संवत् 2054 के प्रथम ऐतिहासिक चातुर्मास का अवसर इस क्षेत्र को प्राप्त हुआ। आचार्यश्री महाप्रज्ञ ने विक्रम संवत् 2057 व 2064 का ऐतिहासिक मर्यादा महोत्सव एवं विक्रम संवत् 2058 में भगवान महावीर की 2600वीं जयंती समारोह का प्रथम चरण गंगाशहर को प्रदान कर इस भूमि का गौरव बढ़ाया।
बीकानेर नगर निगम द्वारा चोरडिय़ा चौक में 'महाप्रज्ञ स्तम्भ" निर्माण, महावीर चौक से नोखा रोड मार्ग का नामकरण अणुव्रत मार्ग, प्राकृतिक चिकित्सा केन्द्र से गांधी चौक तक की सड़क का नाम 'अहिंसा मार्ग" के रुप में किया जा चुका है। इसके अलावा, नोखा रोड पर आचार्यश्री तुलसी समाधि स्थल के समक्ष 'आचार्य तुलसी समाधि द्वार" का निर्माण, बीकानेर रेलवे स्टेशन से गंगाशहर तक के मुख्य मार्ग का नामकरण 'भगवान महावीर मार्ग" किया गया है। तेरापंथ भवन के नजदीक ही महावीर चौक भी अपनी गौरव गाथा लिये हुए है।
गंगाशहर का तेरापंथ धर्मसंघ के लिये ऐतिहासिक एवं भावात्मक महत्व
गणाधिपति गुरुदेव तुलसी का महाप्रयाण, महाप्रज्ञ नामकरण , शासनमाता साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा एवं युवाचार्य महाश्रमण का मनोनयन स्थल होने का गौरव गंगाशहर को होने से इस क्षेत्र का तेरापंथ धर्मसंघ के लिये ऐतिहासिक व भावात्मक महत्व है। आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी द्वारा 'नैतिकता का शक्तिपीठ" नामकरण से सुशोभित 'आचार्य तुलसी समाधि स्थल" जिसे आचार्य श्री महाश्रमण ने " तुलसी धाम " से उल्लेखित किया , आस्था के प्रमुख केन्द्र के रुप में गंगाशहर की ख्याति में श्रीवृद्धि करता है। गुरुदेव तुलसी की स्मृति को चिरस्थायी बनाए रखने के उद्देश्य से गंगाशहर में लगभग एक लाख वर्गफुट भूमि समाधि स्थल बनाने के लिए सेठ तोलाराम बाफना ट्रस्ट की ओर से उपलब्ध करवायी गयी थी, जिस पर आचार्य तुलसी शांति प्रतिष्ठान द्वारा करीब 30,000 वर्गफुट का निर्माण विभिन्न प्रवृत्तियों के लिए किया गया है, जो स्थापत्य कला का अनूठा नमूना है। इस भव्य स्मारक का निर्माण जन सहयोग से हुआ।
ज्ञातव्य तथ्य यह है कि पूरे समाधि स्थल पर कहीं भी ऐसा कोई शिलालेख नहीं है, जिस पर सहयोगकर्ताओं या दानदाताओं के नाम अंकित हों। आचार्य तुलसी के जीवन से सम्बन्धित हस्त निर्मित चित्रों को तुलसी चित्र दीर्घा में प्रदर्शित किया गया है। इस प्रतिष्ठान द्वारा कई अन्य जनकल्याण मूलक साधना-स्थल, प्रेक्षा ध्यान कक्ष , उद्यान, शोध संग्रहालय , भोजनालय ,भ्रमण पथ , आदि प्रवृत्तियों का सञ्चालन किया जा रहा है। वहीं, नैतिकता का शक्तिपीठ (समाधि स्थल ) के ठीक सामने स्थित सुसज्जित व्यवस्थाओं से युक्त आशीर्वाद भवन का उपयोग सामाजिक एवं धार्मिक गतिविधियों के लिए किया जाता है।
इसके अलावा, तेरापंथ भवन से कुछ दूरी पर स्थित बोथरा भवन (जहांगुरुदेव तुलसी ने अपने जीवन की अंतिम रात्रि व्यतीत की थी) को मूलचंद जी बोथरा परिवार द्वारा गुरुदेव की स्मृति में फोटो गैलरी के रुप में परिवर्तित कर दिया गया।
आचार्यश्री महाश्रमण और गंगाशहर
आचार्यश्री महाश्रमण का अनेक बार गंगाशहर में पदार्पण हुआ। आपश्री को इसी धरा पर परम श्रद्धेय आचार्यश्री महाप्रज्ञ ने अपना उत्तराधिकारी मनोनीत किया था। 14 सितम्बर, 1997 को लाखों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में चौपड़ा स्कूल के विशाल प्रांगण में एक भव्य ऐतिहासिक समारोह में युवाचार्य मनोनयन का वह ऐतिहासिक अवसर गंगाशहर इतिहास का एक दुर्लभ प्रसंग है। आचार्यश्री महाश्रमण ने आचार्य बनने के बाद इस पुण्यधरा पर दिसम्बर 2010 में तीन दिवसीय प्रवास कराया। विक्रम वर्ष 2070 में साद्र्धशती (150) बृहद् मर्यादा महोत्सव के अलावा आचार्यश्री तुलसी जन्म शताब्दी समारोह का द्वितीय चरण गंगाशहर में आयोजित होने से यहां के गौरव में श्रीवृद्धि हुई। इससे पूर्व आपश्री का मुनि अवस्था में मुनिश्री सुमेरमल जी (लाडनूं) के साथ भी पदार्पण हुआ था।
साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा और गंगाशहर
विक्रम संवत् 2028, माघ कृष्णा 13, दिनांक 14 जनवरी 1972 को आचार्यश्री तुलसी द्वारा संघ की अष्टम् साध्वीप्रमुखा के रुप में साध्वीश्री कनकप्रभा जी की नियुक्ति इसी पावन धरा पर हुई। उन ऐतिहासिक क्षणों की स्मृतियां लोगों के मानसपटल पर आज भी अंकित है। आपश्री ने प्रथम बार परम श्रद्धेय आचार्यश्री तुलसी से पृथक् स्वतंत्र विहार कर सफल यायावर के रुप में 24 फ़रवरी 1992 से 14 अप्रैल 1992 तक प्रेक्षा -यात्रा की। इस यात्रा में सबसे अधिक प्रवास गंगाशहर को ही प्राप्त हुआ तथा प्रेक्षा यात्रा का दायित्व भी गंगाशहर के कार्यकर्ताओं पर था।
गंगाशहर के साधु-साध्वी
धर्मसंघ में उर्वर धरा के रुप में पहचान रखने वाली गंगाशहर की भूमि से अब तक 94 भाई-बहनें वैराग्य प्राप्त कर गुरुचरणों में दीक्षित हो चुके हैं। वर्तमान में 18 साधु, 37 साध्वियां तथा 6 समणियां गुरु-आराधना में लीन है। परम पावन गुरुवरों द्वारा स्व. मुनिश्री गणेशमल जी 'शासनश्री", मुनिश्री राजकरण जी 'बहुश्रुत परिषद्" के सदस्य , स्व. मुनिश्री बालचंद जी 'शासनश्री 'संघसेवी" व 'गणवत्सल", मुनिश्री पानमल जी 'शासनश्री" , मुनिश्री धर्मचंदजी 'शासनश्री", स्व. मुनिश्री मधुकर जी 'शासन गौरव", स्व. मुनिश्री पूर्णानंद जी 'शासनश्री" और मुनि राजकुमार जी 'मधुर संगायक" संबोधन से संबोधित हुए हैं।
गंगाशहर के श्रावक-श्राविकाएं
राजस्थान प्रदेश में तेरापंथ समाज की दृष्टि से गंगाशहर सर्वोपरि माना जा सकता है। यहां प्रवचन में श्रद्धालुओं की जो संख्या होता है, वैसी कम ही स्थानों पर देखने में आती है। यहां का श्रावक समाज विनीत और पूर्णरुपेण समर्पित है। परम श्रद्धेय आचार्यप्रवर ने अनेक श्रावक-श्राविकाओं को श्रद्धा, भक्ति और सेवाभाव का मूल्यांकन कर उन्हें विशिष्ट संबोधनों से संबोधित किया है। यहाँ के अनेक श्रावकों ने अपनी सेवाभावना से एक विशिष्ट पहचान बनायी है। अनेकानेक प्रबुद्ध श्रावकों ने तेरापंथ समाज की केन्द्रीय संस्थाओं के सर्वोच्च पदों पर रहते हुए अपने दायित्व का निर्वहन कर अपनी उल्लेखनीय सेवाएं दी और देते आ रहे हैं।
केन्द्रीय संस्थाओं द्वारा समय-समय पर अनेक सम्मानों द्वारा भी स्थानीय श्रावक समाज को सम्मानित किया जाता रहा है। जिनमें तेरापंथ के सर्वोच्च सम्मान 'समाज भूषण" से श्री छोगमल चौपड़ा एवं श्री खेमचंद सेठिया को सम्मानित किया जा चुका है। श्री धर्मचंद चौपड़ा को 'प्रशासन पुरुष" एवं 'तेरापंथ रत्न"से मरणोपरान्त संबोधित किया जा चुका है, जो पूरे गंगाशहर तेरापंथ समाज के लिए गौरव की बात है।
तेरापंथ समाज की केन्द्रीय संस्थाओं में सर्वोच्च पद पर छोगमल जी चोपड़ा , सुगन चंद जी आंचलिया , खेमचंद जी सेठिया , धरम चन्द चोपड़ा , श्रीमती सुगनीदेवी पुगलिया ,श्रीमती सज्जन चोपड़ा , श्रीमती मीरादेवी बैद , गोपीचंद जी चोपड़ा , भंवर लाल डागा , जैन लूणकरण छाजेड़ , महावीर रांका , हंसराज डागा इत्यादि व्यक्ति का नाम प्रमुखता से आता है।
स्थानीय स्तर पर भी श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा, तेरापंथ युवक परिषद् एवं तेरापंथ महिला मंडल व अणुव्रत समिति के माध्यम से सैकड़ों कार्यकर्ता अपनी निष्ठापूर्ण सेवाएं दे रहे हैं। इनके साथ-साथ तेरापंथ किशोर मंडल और कन्या मंडल भी पूर्णत: सक्रिय हैं। आचार्यों की कृपादृष्टि इस क्षेत्र पर निरन्तर बनी रहे एवं यह क्षेत्र धर्मसंघ के विकास एवं प्रभावना में सदा संलग्न बना रहे, ऐसी हमारी हार्दिक मंगलकामना, आंतरिक अभिलाषा एवं सुदृढ़ संकल्प है।
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