दमयन्ती की दुनिया - प्री-वेडिंग शूट

दमयन्ती की दुनिया - प्री-वेडिंग शूट


रिंकी की दोस्त आरती अपने प्री-वेडिंग शूट को लेकर बहुत उत्साहित है। आखिर हो भी क्यों ना... उसके ससुराल वाले भले पारम्परिक (दकायानूसी) विचार वाले हों पर प्री-वेडिंग शूट पर कुछ भी करने-पहनने पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। कहते हैं- घर में हम पारम्परिक हैं, पर बाहर हम आजाद ख्यालात के हैं। ऐसे विचार वास्तव में प्रशंसा योग्य हैं कि घालमेल करने में वे कितने एक्सपर्ट हैं।

हमारे समाज सुधारक सर्वांगीण विकास के लिए भले कितनी मशक्कत कर रहे हों, पर बिना कुछ प्रयास किये शादी-ब्याह के आयोजनों ने कितना विकास और आधुनिकीकरण किया है। इससे समाज सुधारक सन्तुष्ट हो सकते हैं।


प्री-वेडिंग शूट हमारे शादी-ब्याह में होने वाले रीति-रिवाजों के विकास में एक मील का पत्थर है। हमारे जमाने से लेकर अब तक शादी-ब्याह के रीति-रिवाजों ने कितना विकास किया, वर-वधू के परिवारों की सोच में कितने नये कीर्तिमान स्थापित किये, वेडिंग के स्वरूप को कितना डिफरेंट लुक दिया गया... यह सब दिखता है। जैसे फैशन लुक, वैन्यू की सजावट, थीम कलचर और सबसे खास पैकिंग या प्रजेन्टेशन... मोल को अनमोल बनाने के नये-नये तरीके।

मैंने अपनी भतीजी को उसकी शादी में साड़ी गिफ्ट देने के लिए बैग ली तो रिंकी-पिंकी मुझ पर बरस ही पड़ी। मम्मा, भला गिफ्ट कोई ऐसे दिया जाता है...?? और फिर बाजार से नये डिजाइन के पैकिंग आईटम लाये गये... शायद साड़ी के मोल के बराबर। तब जाकर यह आईटम गिफ्ट तैयार हुआ।

प्री-वेडिंग शूट भी शादी समारोह का एक खास हिस्सा बन गया है। फंडा अनोखा है। होने वाले दूल्हा-दुल्हन अपने विभिन्न पोज से अपने प्रेम और निकटता का इजहार करते दिखायी देते हैं। समाजशास्त्री भी कहते हैं- प्री-वेडिंग, एक-दूसरे को समझने, जानने और विभिन्न पोज से प्रेम इजहार करने का नायाब तरीका है। नये स्टाईल के कपड़े पहनों, पोज से नये अंदाज क्रिएट करो, एक अच्छी लोकेशन तय करो। यह सब आपके स्टेट्स और क्रियेटिव आउटलुक की झलक है, जो तय करती है कि आपकी आपस में कैसी निभेगी।


आरती ने प्री-वेडिंग के लिए निकटतम हिल स्टेशन की हरी-भरी वादियों को चुना। न्यौता रिंकी-पिंकी को भी था... मैंने यह सोचकर हाँ कर दी कि अपने जमाने में हम इससे वंचित रह गये थे। ऐसे में रिंकी द्वारा आँखों देखा हाल सुनकर क्या यह तय नहीं कर सकेंगे कि विभिन्न पोज से कितना प्रेमरस बरसा। जिसने क्विक फिक्स जैसा अटूट बन्धन बना दिया।

रिंकी ने बताया कि प्री-वेडिंग में भावनाएं नहीं, कैमरा देखा जाता है। शूट से जुड़ी हर चीज पर ध्यान देना... लोकेशन, वार्डरोब, फोटोग्राफर, कन्सेप्ट और क्रियेटिविटी... हर शूट को आकर्षक बना देती है। नये-नये कन्सेप्ट बाजार में उपलब्ध हैं। वर-वधू रुचि अनुसार चयन करके लव फोर एवर का इजहार कर सकते हैं।

हिल स्टेशन पर फोटो शूट के दौरान कितने एडवेन्चर शूट लिये गये, पहाड़ी से उतरने के सीन पर एक बार तो ऐसा लगा कि जैसे गिर ही जायेंगे... दोनों हाथ फैलाकर पहाड़ी से नीचे उतरना था। फिर एक-दूसरे के नजदीक आना... गनीमत समझो कि आरती के पैर में सिर्फ मोच आयी, पर शूट में सबकुछ अच्छा दिखा। एक-दूसरे को केक खिलाते वक्त आँखें कैमरे की तरफ तो केक मुँह की बजाय नाक की तरफ जा रही थी। दूल्हे को फूलों से एलर्जी थी, इसलिए फूलों के बीच प्रेम के इजहार में छींके बार-बार व्यवधान डाल रही थी। उधर बैकग्राउंड में गाना- साथ जियेंगे साथ मरेंगे, सारी बाधाओं को पार करने का आश्वासन दे रहा था। और मुगले आजम का वह सीन, जिसमें अनारकली सलीम को गुलाब का फूल सुंघा रही थी, वैसा ही पोज देने में पूरा एक घण्टा लग गया... प्रेमी की छींकें रूक ही नहीं रहीं थी। पर थीम था तो बाधाओं की क्या परवाह...।


फोटोग्राफी में पोज देने का अच्छा अभ्यास कराया गया, ताकि मजबूत रिश्ते के रूप में एक कहानी को दर्शा सके। ऐसी खूबसूरत तस्वीरें ली गयीं, जो जीवनभर यादगार दस्तावेज के रूप में साथ रहने का वादा था। दोस्तों ने भी कहा- फेवीकोल का जोड़ है, टूटेगा नहीं...।

और फिर वैसी ही शानदार शादी के फोटो शूट। सब कुछ कैमरा ही तय कर रहा था कि वरमाला कितनी इंच ऊँची जायेगी, होटों का फैलाव कितनी इंच का हो, विदाई पर क्या सीन देना है, ताकि मेकअप खराब ना हो... कैसे चलना, कितना गले मिलना, ताकि शूट में सबकुछ क्लीयर आ सके।

मैं सोच रही थी कि प्रेम को पक्का करने, जीवनभर साथ रहने, एक-दूसरे को समझने की इतनी प्री-प्रेक्टिस, तैयारी... फोटोशूट कम्पनियां अन्य वस्तुओं की तरह अटूट बन्धन की लाईफलोंग गारन्टी तो देती होगी। अनबन होने पर बीच में कितनी बार रिपेयरिंग का वादा करती होगी...।

नहीं माँ। रिंकी ने समझाया। यहाँ वस्तु से नहीं, इनसानों से वास्ता है। और उनकी गारन्टी भला कौन सी कम्पनी देती है। आरती तो शादी के एक महीने बाद ही रहने के लिये वापस मायके लौट आयी, क्योंकि परिवार के नियम-कायदे रास नहीं आये...।

ऐसे में अटूट बन्धन की प्री-प्रेक्टिस का क्या फायदा...???

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