उत्तेजना अपने आप में हिंसा क्यूंकि मन से भी होती है हिंसा

हिंसा एक समस्या है। यह ऐसी समस्या है, जो भूतकाल  में थी, वर्तमान में है और भविष्य  में नहीं होगी, ऐसा विश्वास नहीं है। हिंसा कब होती है, क्यों होती है, कैसे होती है और इसकी परिणति किस रूप में होती है ? इन सारे सवाल के समाधान में आचार्य तुलसी कहते  हैं कि  हिंसा होने का कोई काल निर्धारित नहीं होता। वह कभी भी और कहीं भी घटित हो सकती है। क्योंकि हिंसा का उपादान आदमी के भीतर रहता है। छोटा-सा निमित्त मिलते ही वह उभर कर बाहर आ जाता है। ढेर सारे घास में एक छोटी-सी चिनगारी रख दी जाए तो पूरी घास भस्मसात हो जाती है। हिंसा की आग भी छोटा-सा निमित्त मिलते ही भभक उठती है। उस आग पर काबू पाना कठिन हो जाता है।

हिंसा  होने का मूलभूत कारण है हिंसा के संस्कार। वे संस्कार एक जन्म से नहीं, जन्म-जन्म से संचित होते हैं। अपने विचारों और हितों के प्रतिकूल बात सामने आने पर वे संस्कार उत्तेजित होते हैं। उत्तेजना अपने आप में हिंसा है। उसके कारण हिंसा का स्थूल रूप भी सामने आ जाता है।

हिंसा शस्त्र से ही हो, यह आवश्यक नहीं है। मन में हिंसा हो सकती है, वाणी से हिंसा हो सकती है, शरीर से हिंसा हो सकती है। राजनैतिक माहौल में हिंसा हो सकती है। वैचारिक एवं व्यावसायिक स्तर पर हिंसा हो सकती है। सामाजिक संदर्भों में हिंसा हो सकती है और सम्प्रदायिक के आधार पर भी हिंसा  भड़क सकती है। हिंसा की यात्रा के लिए इतने रास्ते खुले हुए हैं कि उनको समझ पाना भी कठिन है।

किसी व्यक्ति को अपने अधीन बनाना, उस पर हुकूमत चलाना, उसे सताना, मानसिक यातना देना आदि सब हिंसा की परिणतियां है। इसकी सबसे अधिक स्थूल परिणति है-प्राण-वियोजन। किसी अजनबी व्यक्ति की आकस्मिक मृत्यु देखकर भी संवेदनशील व्यक्ति का मन उद्वेलित हो जाता है। ऐसी स्थिति में बेगुनाह लोगों को जानबूझकर मौत के घाट उतारना समूची मानव जाति में दहशत पैदा करना है। मेरे अभिमत से यह क्रूरता की पराकाष्ठा है। यह क्रूरता भी एक प्रकार की मदिरा है, जो व्यक्ति की करुणा का रस सोखकर उसे मानव से दानव बना देती है। प्राचीनकाल में सुरा के तीन रूप मान्य थे-

प्रमदा मदिरा लक्ष्मी विज्ञेया त्रिविधा सुरा।

दृष्टृवैवोन्मादयेदेका पीता चान्यातिसंग्रहात्।।

सुरा के तीन रूप हैं-स्त्री, मदिरा और लक्ष्मी। स्त्री में इतना नशा होता है कि वह उसे देखने वाले को देखने मात्र से उन्मत्त बना देती है। मदिरा का नशा उसे पीने के बाद चढ़ता है और लक्ष्मी का नशा उसका अतिसंग्रह होने पर चढ़ता है। इन तीनों की मादकता मनुष्य का अनुभूत सत्य है। कुछ चीजें इनसे भी अधिक मादक है। अहं की मादकता, क्रूरता की मादकता आदि को इसी कोटि में लिया जा सकता है।

एक और मादकता है इस संसार में। वह है साम्प्रदायिकता की मादकता।सम्प्रदाय की सृष्टि बहुत सही उद्देश्यों से हुई होगी पर जिस रूप में इसका इस्तेमाल हो रहा है, वह रूप बहुत ही विकृत है, भद्दा है। उसे देखकर लगता है कि सम्प्रदाय का अस्तित्व में आना ही एक बड़ी भूल थी। दूसरी भूल हो रही है धर्म और सम्प्रदाय को समझने की। सम्प्रदाय सम्प्रदाय है और धर्म धर्म है, इस बात को वे समझ सकते हैं, जो रस और छिलके के अस्तित्व को उनकी उपयोगिता के संदर्भ में देखते हैं।

साम्प्रदायिकता भी हिंसा का एक कारण है। साम्प्रदायिकता हिंसा का परंपरा नयी नहीं है। विश्व का इतिहास ऐसी भयंकर दुर्घटनाओं से भरा हुआ है, जो साम्प्रदायिक हिंसा का दस्तावेज है। भिन्न-भिन्न धर्म सम्प्रदायों के बीच हुए संघर्ष और उनके दुष्परिणाम जितने घातक रह हैं, एक ही धर्म को मानने वाले सम्प्रदायों की हिंसा भी कम घातक नहीं है। एक ओर वैदिक संस्कृति एवं श्रमण संस्कृति के बीच हिंसा की आग प्रज्ज्वलित की गई, वहां दूसरी ओर आर्यसमाजी और सनातनी, दिगम्बर और श्वेताम्बर, सिया और सुन्नी, प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक आदि एक ही धार्मिक विश्वास रखने वाली दो-दो शाखाओं में जमकर संघर्ष हुआ। ऐसे संघर्ष के समय असामाजिक तत्वों को खुलकर खेलने का मौका मिलता है। असामाजिक तत्वों का अथवा साम्प्रदायिक तत्वों द्वारा शुरू की गई इस लड़ाई का अंत होता है हिंसा में, बिखराव में वैमनस्य में और लोकजीवन को अस्त-व्यस्त करने में। गलत तत्व अपना प्रयोजन सिद्ध होने के बाद भूमिगत हो जाते हैं, बदनामी का तिलक निकलता है धर्म के माथे पर। जबकि संसार का कोई भी धर्म हिंसा को प्रश्रय दे ही नहीं सकता।

हिन्दुस्तान अनेक बार साम्प्रदायिक हिंसा का शिकार हुआ है। इस देश की शान्तिमय जनता को साम्प्रदायिक उन्माद के हादसे देखने पड़े हैं। आज भी देश में यत्र-तत्र जो हिंसक वरदातें हो रही हैं, क्या उनमें जनता की प्रेरणा है ? जनता शान्ति से जीना चाहती है। उसके शान्ति सरोवर में कंकड़-पत्थर फेंकर तरंगें उठाने वाले वे लोग हैं, जो साम्प्रदायिक मानसिकता के दास हैं। जब-जब उनके दिमाग पर साम्प्रदायिक मादक का प्रभाव घनीभूत होता है, वे घासफूस के ढेर में चिनगारी लगाकर स्वयं छिप जाते हैं। ऐसे लोग मनुष्यों के हत्यारे तो हैं ही मानवीय मूल्यों के भी हत्यारे हैं।  साम्प्रदायिकता की मादकता सबसे भयंकर मादकता है। इस सत्य को लोग समझें, साम्प्रदायिकता की जड़ों को उखाड़ें, एक स्थिर एवं निश्चित भविष्य को संवारने का संकल्प लें। बढ़ती हुई हिंसा की समस्या का यह सर्वाधिक सरल समाधान है।

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