हिंसा एक समस्या है। यह ऐसी समस्या है, जो भूतकाल में थी, वर्तमान में है और भविष्य में नहीं होगी, ऐसा विश्वास नहीं है। हिंसा कब होती है, क्यों होती है, कैसे होती है और इसकी परिणति किस रूप में होती है ? इन सारे सवाल के समाधान में आचार्य तुलसी कहते हैं कि हिंसा होने का कोई काल निर्धारित नहीं होता। वह कभी भी और कहीं भी घटित हो सकती है। क्योंकि हिंसा का उपादान आदमी के भीतर रहता है। छोटा-सा निमित्त मिलते ही वह उभर कर बाहर आ जाता है। ढेर सारे घास में एक छोटी-सी चिनगारी रख दी जाए तो पूरी घास भस्मसात हो जाती है। हिंसा की आग भी छोटा-सा निमित्त मिलते ही भभक उठती है। उस आग पर काबू पाना कठिन हो जाता है। हिंसा होने का मूलभूत कारण है हिंसा के संस्कार। वे संस्कार एक जन्म से नहीं, जन्म-जन्म से संचित होते हैं। अपने विचारों और हितों के प्रतिकूल बात सामने आने पर वे संस्कार उत्तेजित होते हैं। उत्तेजना अपने आप में हिंसा है। उसके कारण हिंसा का स्थूल रूप भी सामने आ जाता है। हिंसा शस्त्र से ही हो, यह आवश्यक नहीं है। मन में हिंसा हो सकती है, वाणी से हिंसा हो सकती है, शरीर से हिंसा हो...