नेपाल में भूकम्प की इस त्रासदी के बीच भारत के जैन तेरापंथ के आचार्य महाश्रमण

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नेपाल में  भूकम्प की  इस त्रासदी के बीच भारत के जैन तेरापंथ के आचार्य महाश्रमण अपने समाज के साथ घिर गये हैं। आचार्य महाश्रमण तेरापंथ के प्रथम आचार्य हैं जिन्होंने भारत से बाहर  विदेशी क्षेत्र को अपनी पैदल यात्रा के लिए चुना।  वो पिछले एक माह से नेपाल में ही विचरण कर रहें हैं। साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा भी नेपाल के वीरगंज क्षेत्र में प्रवास कर रही हैं। इनका आगामी चातुर्मास  भी विराटनगर में घोषित है. 
संभवतया आचार्य महाश्रमण ने  नेपाल यात्रा कि घोषणा से पूर्व यह नहीं आंकलन किया गया की  नेपाल   दुनिया के उन देशों में प्रमुख है जहां भूकंप का जोखिम सबसे ज्यादा है। इसका एक बड़ा कारण उसका हिमालयी क्षेत्र में स्थित होना है। इसी पर्वतीय क्षेत्र में भारत का भी एक बड़ा हिस्सा है और इसी कारण नेपाल के साथ-साथ भारत का अच्छा-खासा इलाका भूकंप के लिहाज से जोखिम भरा है। देश के एक बड़े भूभाग समेत बांग्लादेश और तिब्बत के कुछ हिस्सों के बाद सबसे ज्यादा नेपाल में कहर ढाने वाले भूकंप ने प्रकृति के समक्ष मनुष्य को एक बार फिर असहाय रूप में दिखाया। इस  भीषण भूकंप ने एक बार फिर साबित किया है कि इस प्राकृतिक आपदा की अनदेखी कितनी खतरनाक हो सकती है। चूंकि मनुष्य के लिए भूकंप का अनुमान लगाना अभी भी टेढ़ी खीर बना हुआ है इसलिए वह अक्सर तबाही के मंजर सामने लाता है। फिलहाल वैज्ञानिक इतना ही जानने में समर्थ हैं कि भूकंप की आशंका वाले इलाके कौन से  हैं?  नेपाल की राजधानी काठमांडू और उसके दूसरे प्रमुख शहर पोखरा के बीच केंद्रित भूकंप न केवल तीव्रता लिए हुए था, बल्कि उसकी अवधि भी ज्यादा रही। इसी कारण वहां जन-धन की हानि भी सबसे अधिक है। जन-धन की हानि से बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तार प्रदेश भी अछूता नहीं रहा। इस विपदा के समय एक अच्छे पडोसी का धर्म निभाते हुए  भारत सरकार ने बचाव और राहत के लिए तत्परता का सराहनीय प्रदर्शन किया। भूकंप की भयावहता का अंदेशा बढ़ने के साथ ही मोदी सरकार जिस तरह बिहार, बंगाल और उत्तार प्रदेश के साथ-साथ नेपाल में बचाव और राहत के दल भेजने में समर्थ रही उससे भारत की साम‌र्थ्य नए सिरे से सामने आई। इस संदर्भ में सबसे उल्लेखनीय यह है कि नेपाल को शीघ्र से शीघ्र हरसंभव सहायता प्रदान करने के लिए न केवल व्यापक उपाय किए गए, बल्कि उन पर अमल भी शुरू कर दिया गया।
नेपाल में जन-धन की जैसी हानि हुई है उसे देखते हुए इस पड़ोसी देश को जितनी सहायता प्रदान की जाए कम है। यह लगभग तय है कि नेपाल को आगे भी और अधिक मदद की आवश्यकता होगी। नेपाल में केवल सैकड़ों लोग मारे ही नहीं गए हैं, बल्कि कई ऐतिहासिक इमारतों को भी अच्छी-खासी क्षति पहुंची है। पहले से तमाम समस्याओं के साथ आर्थिक संकट से जूझ रहे नेपाल के लिए भूकंप जनित त्रासदी से उबरना आसान नहीं होगा। वहां के लोग इसके लिए आश्वस्त हो सकते हैं कि भारत उनके साथ खड़ा नजर आएगा। भारत सरकार नेपाल को आनन-फानन मदद देने में समर्थ हो सकी तो इसीलिए कि पिछले कुछ वर्षो में आपदा प्रबंधन के ढांचे को दुरुस्त करने की दिशा में कई ठोस कदम उठाए गए हैं। इन कदमों का लाभ उत्ताराखंड की त्रासदी से निपटने में भी मिला और श्रीनगर की बाढ़ का मुकाबला करने में भी। युद्धग्रस्त यमन से भी भारतीयों के साथ-साथ अन्य देशों के नागरिकों को निकालने में जो सफलता मिली उसके पीछे भी वह तंत्र है जिसे पिछले कुछ वर्षो में दुरुस्त करने पर विशेष ध्यान दिया गया है। बावजूद इस सबके आपदा प्रबंधन के तंत्र को और अधिक सक्षम और प्रभावी बनाने की आवश्यकता है। इसलिए और भी, क्योंकि मौसम की प्रतिकूलता भी बढ़ रही है। यह किसी से छिपा नहीं कि देश का एक बड़ा हिस्सा भूकंप के अंदेशे वाले क्षेत्र में है। आपदा प्रबंधन तंत्र को दुरुस्त करने के साथ ही केंद्र और राज्य सरकारों को यह भी देखना होगा कि बुनियादी ढांचे को कैसे मजबूती मिले।उत्तारकाशी, लातूर, भुज में आ चुके भूकंप और तमिलनाडु में आई सुनामी के वाकये साबित करते हैं कि भूकंप से बचाव की मुस्तैदी ही जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है। हर भूकंप गलतियों को सुधारने का मौका दिए बगैर अपने पीछे सिर्फ विनाश की कहानी छोड़ता है। इसलिए आपदा नियंत्रण ही वह तरीका है, जो हमें इसकी मार से बचा सकता है। बहरहाल  भारत के प्रवासियों व आचार्य महाश्रमण के सम्पूर्ण समाज की सुरक्षा की माकुम व्यवस्थाओं की आवश्यकता  है. तेरापंथ का साधु व  श्रावक  समाज आपदा को मध्य नजर रखते हुए नियमों से पर हटकर निर्णय की अपेक्षा कर रहा है.

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