मैं खुशनसीब हूँ की पत्नी से मेरी अब तक पट रही है

मैं खुशनसीब हूँ की  पत्नी से मेरी अब तक पट रही है
मैंने पत्नी को और पत्नी में मुझको बहुत चाहा
 माता -पिता की सेवा श्रुसेवा चाहत से की  ,
 बच्चो का लालन-पालन  दिल से किया 
 यह नहीं की हमेशा आपस में पटती ही रही
नोक-झोंक भी खूब चलती रही पर
कभी नाराज़ हुयी कभी उसने मुझे मनाया
 कब ,क्यूँ और कैसे ये सब होता गया
कब ३५ साल बीत गए यह पता ही नहीं चला
अभी तो प्रथम मिलन , शादी और हनीमून की यादें ही नहीं भूले
और उम्र हमारी ऐसे ढल गयी जैसे दोपहर का सूरज ढल गया . .
सच कहूँ इस ज़िंदगी में बड़ा मज़ा आया
 चुहलबाजी में कब जवानी से बुढ़ापा आ गया
औलाद हुयी, पापा मम्मी बने ,
दादा -दादी और नाना -नानी भी बन  गए
हमसफ़र ऐसा  मिला, ज़िन्दगी की यात्रा कट रही है
मैं खुशनसीब हूँ की  पत्नी से मेरी अब तक पट रही है

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