लूणकरण छाजेड की हरीश भादाणी जी को श्रद्धांजलि

जन कवि हरीश भादाणी का 2 अक्‍टूबर, 2009 को निधन हो गया।
मेरी ओर से विनम्र श्रद्धांजलि।

हरीश भादाणी जनकवि थे, यह तो सभी जानते हैं। मैंने अपने जीवन में ऐसा एक ही जनकवि देखा है-हरीश भादाणी। जो ठेलों पर खड़े होकर मजदूरों के लिए हाथों से ललकारते हुए गाते थे- बोल मजूरा, हल्ला बोल...।
भादाणी जी से मेरे लगभग बीस साल पुराना हैं। हमेशा मेरी न्यूज़ पेपर शॉप से जनसता लेन आते थे । कई बार कुछ चर्चाये भी होती थी।
मैने जब अपना अख़बार थार एक्सप्रेस के विशेषांकनिकाले तो इतने बड़े कवि होने के बावजूद हरीश जी ने विशेषांक के लिए कवितायेँ देकर होसला बढाया । हरीश जी के यादों के इतने बक्से हैं कि उन्हें तरतीबवार खोल भी नहीं सकता। भादाणी जी की रचनाओं का मॉडल कहीं दूसरा देखने को नहीं मिलता। उनकी अपनी विशिष्ट शैली थी। वे अपने किस्म के कवि थे। अपने ढंग से जिए और अपने ढंग से चले गए।
ऐसा कवि ही लिख सकता है, ‘रोटी नाम सत है, खाए से मुगत है, थाली में परोस ले, हां थाली में परोस ले, दाताजी के हाथ मरोड़ कर परोस ले।‘
भादाणी जी का एक गीत है, ‘मैंने नहीं, कल ने बुलाया है... आदमी-आदमी में दीवार है, तुम्हें छेनियां लेकर बुलाया है, मैंने नहीं, कल ने बुलाया है।‘ भादाणी जी एक मित्र के घर गए तो इस गीत के बारे में उनकी बच्ची ने कहा, ‘दद्दू, आपकी एक कविता हमारी पाठ्यपुस्तक में है।‘ उन्होंने पूछा, ‘मास्टर जी ने कैसी पढ़ाई।‘ बच्ची बोली, ‘बहुत अच्छी पढ़ाई। उन्होंने पढ़ाया कि एक प्रेमी अपनी प्रेमिका को मिलने के लिए बुला रहा है।‘ मुझे और मेरे जैसे कई मित्रों को लगता है कि भादाणी जी के गीत और कविताओं के साथ शिक्षकों ने ही अन्याय नहीं किया है, बड़े शिक्षकनुमा आलोचकों ने भी अन्याय किया है। बड़े आलोचक जिसे चाहें, उसे उठा कर आसमान पर बिठा देते हैं, लेकिन वे हरीश भादाणी के आसमान को छू तक नहीं पाए।
मेडिकल कॉलेज को देह दान कर गए ताकि उनकी देह भी जनता के काम आए। वे ऐसे जन थे, ऐसे जनकवि थे। मैंने कोई दूसरा जनकवि नहीं देखा।विनम्र श्रद्धांजलि.

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