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बीकानेर में होम्योपैथी के एक स्वर्णिम युग का अंत, डॉ. झंवरलाल नाहटा का देवलोकगमन

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 बीकानेर में होम्योपैथी के एक स्वर्णिम युग का अंत, डॉ. झंवरलाल नाहटा का देवलोकगमन   बीकानेर के चिकित्सा एवं पत्रकारिता जगत के लिए आज का दिन अत्यंत शोकपूर्ण है। होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति के प्रख्यात चिकित्सक, प्रखर विचारक एवं प्रतिष्ठित समाचार पत्र ‘थार एक्सप्रेस’ के वरिष्ठ लेखक डॉ. झंवरलाल नाहटा के देवलोकगमन से शहर ने एक युगद्रष्टा व्यक्तित्व को खो दिया है। उनके निधन से न केवल नाहटा परिवार, बल्कि संपूर्ण बीकानेर के चिकित्सा जगत में ऐसी रिक्तता उत्पन्न हुई है, जिसकी भरपाई असंभव प्रतीत होती है।  कलम और क्लिनिक का अनूठा संगम डॉ. नाहटा केवल एक कुशल चिकित्सक ही नहीं, बल्कि विचारशील लेखक और समाजप्रेरक भी थे। वर्षों तक ‘थार एक्सप्रेस’ के माध्यम से उन्होंने होम्योपैथी और स्वास्थ्य विषयों पर जनजागरूकता का कार्य किया। उनके लेख सरल भाषा में जटिल रोगों के समाधान प्रस्तुत करते थे और पाठकों से एक आत्मीय रिश्ता स्थापित करते थे। वे चिकित्सा को केवल उपचार नहीं, बल्कि जीवनशैली मानते थे।। कलम और क्लिनिक का अनूठा संगम डॉ. नाहटा केवल एक कुशल चिकित्सक ही नहीं थे, बल्कि वे एक प्रखर विचारक...

खुशहाल जीवन के लिए प्रेक्षा ध्यान आवश्यक

खुशहाल जीवन के लिए प्रेक्षा ध्यान आवश्यक आधुनिक जीवनशैली की भागदौड़, निरंतर बढ़ता मानसिक तनाव और अनिश्चितता के इस दौर में 'शांति' एक दुर्लभ वस्तु बन गई है। आज मनुष्य बाहरी सुख-सुविधाओं के अंबार में तो जी रहा है, लेकिन उसके भीतर का एकांत कोलाहल से भरा है। ऐसे में 'प्रेक्षा ध्यान' (Preksha Meditation) केवल एक आध्यात्मिक पद्धति नहीं, बल्कि एक अनिवार्य जीवन-कौशल के रूप में उभरकर सामने आया है। यह वह विज्ञान है, जो हमें सिखाता है कि किस प्रकार योग और ध्यान के जरिए मन से नकारात्मकता की कालिमा को धोकर सकारात्मक ऊर्जा का संचय किया जा सकता है। प्रेक्षा ध्यान का अर्थ है 'गहराई से देखना'। यह विपश्यना या साक्षी भाव जैसा है, जहां हम विचारों, भावनाओं और शारीरिक संवेदनाओं को बिना जजमेंट के, बस दृष्टा बनकर देखते हैं। यह 'प्र+ईक्षा' से बना शब्द है, अर्थात् गहन अवलोकन। इसमें श्वास प्रेक्षा, शरीर प्रेक्षा, चैतन्य प्रेक्षा जैसे अभ्यास शामिल होते हैं। शुरुआत में सांसों को देखना, फिर शरीर के अंगों को महसूस करना, और अंत में भावनाओं को साक्षी भाव से निरीक्षण करना—यह सब मन की गहर...

गंगाशहर एवं तेरापंथ धर्मसंघ

- जैन लूणकरण छाजेड़, गंगाशहर (बीकानेर) राजस्थान के प्रमुख शहरों में अग्रणी बीकानेर का उपनगरीय क्षेत्र गंगाशहर व्यवस्थित ढंग की बसावट के साथ ही धार्मिक-आध्यात्मिक, सामाजिक एवं आर्थिक सम्पन्नता के चलते देशभर में अपनी विशेष पहचान रखता है। यह क्षेत्र सर्वधर्म सद्भाव का जीता जागता प्रतीक है। बीकानेर के कुशल प्रशासक महाराजा गंगासिंह जी ने अपने नाम से विक्रम संवत् 1948 में इसकी स्थापना की थी। बीकानेर शहर से 5 किमी दूर दक्षिण दिशा में भीनासर एवं बीकानेर के मध्य अवस्थित पूरा गंगाशहर दो खंडो में आबाद हुआ। सर्वप्रथम पुरानी लेन बसी तदुपरांत विक्रम संवत् 1970 में नई लेन आबाद हुई। कस्बाई और शहरी संस्कृति के अद्भुत समन्वय में स्थापित गंगाशहर की गौरवशाली ऐतिहासिक विरासत का कोई सानी नहीं है। भौगोलिक दृष्टि से गंगाशहर के दक्षिण में भीनासर, पूर्व में घड़सीसर एवं पश्चिम में सुजानदेसर है। बीकानेर, उदयरामसर एवं घड़सीसर  से गंगाशहर काफी निचाई पर बसा हुआ है। तीनों तरफ से ऊँचाई होने से रात्रिवेला में प्रवेश करते हुए यह क्षेत्र एक मनोहारी दृश्य उपस्थित करता है।   गंगाशहर का नगर नियोजन सुन्दरतम ए...

प्रेक्षाध्यानः ध्यान का एक अभिनव प्रयोग

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प्रेक्षाध्यानः ध्यान का एक अभिनव प्रयोग जैन परंपरा में प्रेक्षाध्यान एक प्राचीन, विशिष्ट और अभिनव ध्यान-पद्धति है। प्राचीन जैन ग्रंथों से खोजकर, इसका पुनरुद्धार कर और नए प्रयोगों के साथ इसे आधुनिक युगानुकूल बनाकर श्वेतांबर तेरापंथी जैनाचार्य श्री तुलसी, आचार्य श्री महाप्रज्ञ और आचार्य श्री महाश्रमण ने मानव समाज के लिए अतुलनीय योगदान दिया है। इसकी विशिष्टता, विरलता और गहन उपलब्धियों के कारण इसे अभिनव कहा जाता है। प्रेक्षाध्यान का अर्थ 'प्रेक्षा' शब्द संस्कृत की 'ईक्ष' धातु से बना है, जिसका अर्थ है 'देखना'। प्रईक्षा प्रेक्षा, अर्थात् गहराई से देखना। यह विपश्यना के समान है, जिसमें आत्मा द्वारा सूक्ष्म आत्मा, मन द्वारा सूक्ष्म मन, और स्थूल चेतना द्वारा सूक्ष्म चेतना को देखने की साधना की जाती है। 'देखना' ध्यान का मूल तत्व है, इसलिए इस पद्धति को प्रेक्षाध्यान कहा जाता है। चेतना का सामान्य अनुभव तो किया जा सकता है, पर उसे देखना प्रेक्षाध्यान की विशेषता है। भावनाओं को महसूस करने के बजाय उन्हें देखने की साधना भी प्रेक्षाध्यान है। इसके दो सूत्र हैं: 'जानो और द...

संथारा आत्महत्या नहीं, मोक्ष की पावन राह, 76 दिन से तारादेवी बैद की प्रेरक अनशन यात्रा

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 संथारा आत्महत्या नहीं, मोक्ष की पावन राह,  76 दिन से तारादेवी बैद की प्रेरक अनशन यात्रा गंगाशहर, 27 सितंबर 2025। जैन धर्म की पवित्र प्रथा संथारा, जिसे संलेखना भी कहा जाता है, आत्मा की शुद्धि और मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करने वाली एक गहन आध्यात्मिक साधना है। इस प्रथा का जीवंत उदाहरण हैं तारादेवी बैद, जिन्होंने 76 दिनों तक संथारा के माध्यम से अपनी एकाग्रता, सहनशीलता और विनम्रता से सभी को प्रेरित किया है। आज सुबह मुनिश्री कमलकुमार जी और मुनिश्री श्रेयांसकुमार जी ने तारादेवी को दर्शन दिए। तारादेवी ने विनयपूर्वक वंदना कर सुखसाता पूछी, और मुनिश्री द्वारा पूछे गए प्रश्नों—जैसे अरहंतों और सिद्धों के अक्षर, आसोज सुदि का पर्व, और संथारा का दिन—के सटीक उत्तर देकर अपनी मानसिक स्पष्टता का परिचय दिया। मुनिश्री कमलकुमार जी ने इसे एक आदर्श संथारा बताया, जो समुदाय के लिए प्रेरणा का स्रोत बन रहा है। तारादेवी के दर्शन के लिए परिवार, साधु-साध्वियां और दर्शनार्थियों का तांता लगा हुआ है, जो उनकी इस आध्यात्मिक यात्रा को और सार्थक बना रहा है। संथारा क्या है? तेरापंथ महासभा के संरक्षक जैन लूणकरण छाजे...

चातुर्मास: तप, साधना और संयम का पावन काल-

 चातुर्मास (अर्थात् चार महीने) वर्षा ऋतु के दौरान आने वाली वह धार्मिक अवधि है जो हिंदू, जैन और बौद्ध धर्मों में आत्म-शुद्धि, संयम और साधना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह अवधि हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक होती है। चातुर्मास त्याग और तपस्या ही सच्चे सुख का आधार हैं, और संयम से ही आत्मा का उध्दार संभव है। चातुर्मास का धार्मिक महत्व विष्णु शयन की परंपरा (हिंदू धर्म) इस दौरान माना जाता है कि भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसलिए शुभ कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश आदि इस अवधि में नहीं किए जाते। तप और संयम का समय (जैन धर्म) जैन धर्म में चातुर्मास का विशेष स्थान है। जैन साधु-साध्वियाँ इस समय विहार वर्जना (यात्रा न करना) का पालन करते हैं और एक ही स्थान पर रहकर तप, स्वाध्याय, और प्रवचन करते हैं। यह काल श्रावकों के लिए भी व्रत, संयम और धर्माराधना का अनुपम अवसर है।  चातुर्मास के व्यावहारिक कारण वर्षा ऋतु की कठिनाई: प्राचीन समय में कीचड़ और नदी-नालों के उफान से यात्रा जोखिम भरी होती थी।  सूक्ष्म जीवों की रक्षा: बरसात में उत्पन्न...

आचार्य तुलसी की पुण्यतिथि पर विशेष आलेख

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अनुशासन , धर्म, संयम और चेतना के युगपुरुष को श्रद्धांजलि भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा में आचार्य तुलसी एक ऐसे युगनायक रहे हैं, जिन्होंने न केवल जैन समाज को नई दिशा दी, बल्कि संपूर्ण मानवता को नैतिक मूल्यों, अहिंसा, अनुशासन और तपस्या की जीवनदृष्टि प्रदान की।आषाढ़ कृष्णा तीज  को हम  महापुरुष आचार्य तुलसी  की पुण्यतिथि मनाते हैं, जिन्होंने अपने तपोबल और चिंतन से हजारों-लाखों लोगों के जीवन में चेतना की अलख जगाई। इस वर्ष 2025 म में यह पुण्यतिथि 14 जून को देश - विदेश में मनायी जायेगी।  जीवन परिचय आचार्य तुलसी का जन्म 20 अक्टूबर 1914 को राजस्थान के लाडनूं नगर में हुआ। 11 वर्ष की अल्पायु में ही वे साधु जीवन में प्रविष्ट हुए और 1936 में मात्र 22 वर्ष की आयु में आचार्य पद पर अभिषिक्त हुए। यह पद उन्होंने जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के नवां आचार्य के रूप में संभाला। उनका नेतृत्व एक आध्यात्मिक क्रांति का प्रतीक बना। एक नया आलोक: अणुव्रत आंदोलन आचार्य तुलसी का सबसे महत्वपूर्ण योगदान 'अणुव्रत आंदोलन' की स्थापना था। इस आंदोलन का उद्देश्य  सामान्य जन को धार्मिक कठोरत...

जीवन में ईमानदारी का प्रभाव importance of honesty in life

जीवन में ईमानदारी का प्रभाव ईमानदारी न केवल एक व्यक्तिगत गुण है, बल्कि यह परिवार और समाज के साथ व्यक्ति के संबंधों को गहराई से प्रभावित करती है। एक ईमानदार व्यक्ति अपने आध्यत्मिक , पारिवारिक, व्यापारिक और सामाजिक दायित्वों को निष्ठा और समर्पण के साथ निभाता है, जिससे उसके रिश्ते अधिक प्रगाढ़ और विश्वासपूर्ण बनते हैं।  ईमानदारी से व्यक्ति निर्भीक और निडर बन जाता है। अपने प्रोफेशन के प्रति जो मनुष्य  हमेशा ईमानदार रहता है वह जीवन में ऊंचाइयों को छूता है।  ईमानदार व्यक्ति: समाज की रीढ़ ईमानदारी मनुष्य का सबसे श्रेष्ठ गुण है, जो उसे न केवल एक अच्छा इंसान बनाता है, बल्कि समाज और राष्ट्र की उन्नति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ईमानदार व्यक्ति सत्यनिष्ठ, पारदर्शी और नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण होता है। वह न केवल अपने लिए, बल्कि अपने परिवार, समाज और देश के लिए भी आदर्श प्रस्तुत करता है। आज के समय में, जब भ्रष्टाचार और स्वार्थपरता बढ़ रही है, ईमानदारी का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। व्यक्तिगत जीवन में ईमानदारी का प्रभाव ईमानदार व्यक्ति अपने विचारों, शब्दों और कर्मों में पारदर्...